पंडितजवाहर लाल नेहरु (1889 -1964 ) एक असाधारण नेता थे. उन्होंने अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही कई आर्थिक सुधार किये. उनके द्वारा की गयी पंचवर्षीय योजना की पहल भारत के आर्थिक विकास की आधार बन गयी. नेहरु का भारत के नव निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उन्होंने औपनिवैशिक अवशेषों पर आर्थिक साम्राज्यवाद की छाया देख ली थी, इसलिए उन्होंने आत्मनिर्भरता और गुट निरपेक्षता की अवधारणा प्रस्तुत की. उनके दूर दृष्टि और आर्थिक सुधारों के कारण ही भारत वैशविक मंदी से अप्रभावित रहा. नेहरु को सुनियोजित विकास का अग्रदूत भी कहा जाता है. उन्होंने सामाजिक समता और आर्थिक समृद्धि को महत्वपूर्ण माना. वह मानते थे की देश की आत्मनिर्भरता का प्रमुख स्रोत विज्ञान एवं तकनीक का विकास है. नेहरु के आर्थिक सुधार
नेहरु देश के विभाजन को आर्थिक दृष्टि से सही नहीं मानते थे. विभाजन के बाद अधिकांश कृषि उत्पादक भूमि पाकिस्तान में चली गई और सम्बंधित प्रसंस्करण फैक्ट्रीज भारत में पड़ गए. जूट का उत्पादन इसका सबसे बड़ा उदहारण रहा.
नेहरु ने 1947 में प्रधानमंत्री के पद में आने के बाद से ही आर्थिक सुधार प्रारंभ कर दिया. उन्होंने आर्थिक क्षेत्रों में राज्य का नियंत्रण सही नहीं माना. भूमि पुनर्वितरण के लिए क़ानून बनाए. पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा कृषि, उद्दोग, एवं शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सरकारी व्यय एवं अनुदान को प्रोत्साहित किया गया.
ग्रामीण विकास
नेहरु ग्रामीण विकास को देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक मानते थे. ग्रामीण विकास के लिए कुटीर उद्दोग को बढ़ावा दिया गया. लघु एवं कुटीर उद्दोग को बेरोज़गारी के समस्या का समाधान माना गया. ग्रामोद्दोग तात्कालिक बेरोज़गारी से राहत प्रदान करता है जो राष्ट्रीय आय के असमानता को कम करने में भी सहायक है. ग्राम उद्दोग के विकास से संसाधनों का पूर्ण प्रयोग, उपभोक्ता वस्तुओं में स्थानीय आत्मनिर्भरता लाती है.
लघु एवं कुटीर उद्दोग में निवेश को बढ़ावा दिया गया. ग्रामीण उद्दोगों के आधुनिकीकरण के लिए तकनीक, विधियों में सुधार को प्रोत्साहित किया गया.
प्रथम तीनो पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण विकास के लिए कृषि विकास, उर्जा और सिंचाई के विकास इत्यादि पर जोर दिया गया. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामोद्दोग निवेश को बढ़ावा दिया गया. ग्रामोद्दोग विकास के लिए लगभग 100 ट्रेनिंग संस्थान और उत्पादक केंद्र खोले गए. उद्दोग क्षमता बढ़ाने के लिए मानव संसाधन में भी वृद्धि की गई.
ओद्दोगिक एवं तकनिकी पद्धति का विस्तार
नेहरु ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया. वह भारी उद्दोगो के स्थापना के पक्ष में थे. उनके अनुसार औद्दोगिक विकास ही देश के अर्थव्यवस्था के विकास को तीव्र गति प्रदान कर सकती है.
नेहरु का मानना था की देश में नई तकनीको और मशीनों के प्रयोग का अर्थ यह नहीं कि वह श्रमिको को बेरोजगार कर उसके स्थान पर लाया जाये बल्कि इनका प्रयोग श्रमिकों के द्वारा तथा संसाधनों के प्रभावपूर्ण प्रयोग से है. बड़े पैमाने के उद्दोगो में तकनीको का प्रयोग अवश्य बढ़ना चाहिए. ग्रामीण तथा लघु उद्दोग कमिटी जून 1955 के अनुसार तय किया गया कि पम्परागत ग्रामोद्दोग में पुरानी तकनीक के स्थान पर नए तकनीको को स्थान दिया जाए.
अर्थव्यवस्था में सरकार का नियंत्रण
नेहरु के आर्थिक नीतियों में मुख्यतः देश के व्यापारिक एवं औद्दोगिक क्षेत्रों पर केन्द्र के नियंत्रण को आवश्यक माना गया. उनके अनुसार देश की अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों में सरकार का नियंत्रण होना चाहिए.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 -61) में औद्दोगिक नीतियों के कार्यान्वयन पर कठोर राज्य कानूनों और लाइसेंस नियमो का काफी प्रभाव पड़ा. यहाँ तक कि किसानो एवं व्यापारियों को भी इन नियमो और सरकारी नियंत्रण का सामना करना पड़ा.
प्रथम तीनो पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण विकास के लिए कृषि विकास, उर्जा और सिंचाई के विकास इत्यादि पर जोर दिया गया. प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामोद्दोग निवेश को बढ़ावा दिया गया. ग्रामोद्दोग विकास के लिए लगभग 100 ट्रेनिंग संस्थान और उत्पादक केंद्र खोले गए. उद्दोग क्षमता बढ़ाने के लिए मानव संसाधन में भी वृद्धि की गई.
ओद्दोगिक एवं तकनिकी पद्धति का विस्तार
नेहरु ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया. वह भारी उद्दोगो के स्थापना के पक्ष में थे. उनके अनुसार औद्दोगिक विकास ही देश के अर्थव्यवस्था के विकास को तीव्र गति प्रदान कर सकती है. नेहरु का मानना था की देश में नई तकनीको और मशीनों के प्रयोग का अर्थ यह नहीं कि वह श्रमिको को बेरोजगार कर उसके स्थान पर लाया जाये बल्कि इनका प्रयोग श्रमिकों के द्वारा तथा संसाधनों के प्रभावपूर्ण प्रयोग से है. बड़े पैमाने के उद्दोगो में तकनीको का प्रयोग अवश्य बढ़ना चाहिए. ग्रामीण तथा लघु उद्दोग कमिटी जून 1955 के अनुसार तय किया गया कि पम्परागत ग्रामोद्दोग में पुरानी तकनीक के स्थान पर नए तकनीको को स्थान दिया जाए.
अर्थव्यवस्था में सरकार का नियंत्रण
नेहरु के आर्थिक नीतियों में मुख्यतः देश के व्यापारिक एवं औद्दोगिक क्षेत्रों पर केन्द्र के नियंत्रण को आवश्यक माना गया. उनके अनुसार देश की अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों में सरकार का नियंत्रण होना चाहिए.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 -61) में औद्दोगिक नीतियों के कार्यान्वयन पर कठोर राज्य कानूनों और लाइसेंस नियमो का काफी प्रभाव पड़ा. यहाँ तक कि किसानो एवं व्यापारियों को भी इन नियमो और सरकारी नियंत्रण का सामना करना पड़ा.
विदेश नीति
हमारी विदेश नीति का मूलाधार आज भी नेहरु का दिया हुआ है. समय के साथ विदेश नीति में बदलाव तो होता रहा है लेकिन बुनियादी अवधारणा में आज भी बहुत परिवर्तन नहीं आया है.भारत के स्वतंत्र होने के पूर्व कांग्रेस पार्टी ने 1925 में विदेशी मामलो कि एक इकाई बनायीं जिसके अध्यक्ष पं. नेहरु थे. उसी समय उन्होंने औपनिवैशिक देशों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास शुरू कर दिया जिसमें बहुत हद तक वह सफल भी रहे.
नेहरु विदेशी निवेश से थोड़ा सावधानी रखना सही मानते थे. उनका मानना था कि विदेशी निवेश को बढ़ावा देने का अर्थ देश को महाशक्ति वाले देशों के दबाव में रहना होगा. किन्तु वह चाहते थे कि भारत अपने विकास के लिए स्वयं आत्मनिर्भर बने.
यदि विदेशी निवेश कि सम्भावना हो तो वो नियमित हो जिसमे रोज़गार के अवसर बढ़ने के साथ-साथ सरकार का नियंत्रण भी रहे. नेहरु के लम्बी अवधि के निवेश कि धारणा को वर्तमान में बढ़ती बैंकिंग से समझा जा सकता है.
पंचवर्षीय योजना

देश कि प्रगति का आधार आर्थिक योजना को माना जाता है. नेहरु ने लगातार तीन पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारम्भ किया. इन योजनाओं में कृषि और औद्दोगिक विकास का पूर्ण ध्यान रखा गया. तीनो योजनाओं में सभी आर्थिक पहलुओं को सम्मिलित किया गया.
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951 -55)
उपलब्धि :
पंचवर्षीय योजना के पहल ने जी.डी.पी 36 प्रतिशत प्रति वर्ष प्राप्त कराया. सिंचाई व्यवस्था में सुधार आया. परन्तु असफलता की बात की जाए तो इस योजना में केवल कुछ ही उद्दोगों का विकास हो पाया तथा नीजी उद्दोगो के विकास में भी कमी आई.
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 -61)
दूसरी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय आय में 25 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा गया. औद्दोगिकरण के साथ- साथ रोज़गार के अवसर बढ़ाने का भी लक्ष्य रखा गया.
उपलब्धि
नेहरू के आर्थिक योजना के प्रयास से खनन उद्दोग का विकास हो पाया जिससे 5 इस्पात संयंत्रो की स्थापना हो सकी. पनबिजली परियोजना का निर्माण, कोयले का उत्पादन बढ़ा, भूमि सुधार उपाय भी तय किये गए. परन्तु उपभोक्ता वस्तुओं के आयात को ख़त्म किया गया. आयात शूल्क बढ़ा दिया गया, नए उद्दोगों के लिए लाइसेंस अनिवार्य कर दिया गया.
- तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961 -66)
नेहरु द्वारा यह अंतिम योजना प्रस्तूत की गई. इसके बाद भी योजना बनते गए.इस योजना में कई उद्देश्य रखे गए- कृषि पर अधिक जोर दिया गया, सब्सिडी, किसानों को पर्याप्त मदद, देश के संसाधनों का प्रभावी प्रयोग, प्रतिवर्ष 5 प्रतिशत से राष्ट्रीय आय में वृद्धि, राष्ट्रीय खाद्यान्न बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि, रोज़गार अवसर प्रदान करना, आर्थिक समानता स्थापित करना, अन्य.
नेहरु की आर्थिक नीतियां यही सपष्ट करती है कि भारत को वह आत्मनिर्भर एवं आर्थिक समता वाले राष्ट्र के रूप में कल्पना करते थे. उनकी आर्थिक नीतियों को अकसर बाद के वर्षों में देश के ग़रीब अर्थव्यवस्था के लिए दोषी ठहराया गया. परन्तु ऐसा नहीं है, नेहरु के निर्णय समय के आवश्यकतानुसार लिए गए. देश के घरेलु संसाधनों के प्रयोग की आवश्यकता आज भी बनी हुई है. भविष्य के नीजिकरण का आधार भी सरकारी नियंत्रण ही रहा. नेहरु ने आर्थिक नीतियां दीर्घकालीन आवश्यकता को देख कर ही बनाये.

lovely article.
ReplyDeleteyou should make it published.
Thanks Lopa
ReplyDeleteAn exceptionally excellent and informative article. I have become the fan of your writing. Please write more such articles to keep us updated.
ReplyDeleteThanks very much Mr. Nandan Arya.
ReplyDelete